Stree Chintan Aur Vimarsh

Author : Rekha Sethi, Rizwana Fatima. Publisher ‏: ‎ Sasta Sahitya (1 January 2025). ISBN No. 978-93-48765-96-3

पिछले कुछ समय में स्त्री-रचनाशीलता का दायरा बढ़ा है। स्त्रियों ने केवल अपनी समस्याओं पर ही नहीं लिखा बल्कि देश-दुनिया के सभी मुद्दे, युद्ध और हिंसा, प्रकृति और पर्यावरण की चिंताएँ; उनके साहित्यिक सरोकारों में शामिल हैं। यह बात और है कि हमारी आलोचना पद्धतियों ने स्त्री लेखन में केवल स्त्री समस्याओं पर ही ध्यान केंद्रित किया है। इसीलिए स्त्री-विमर्श को साहित्यिक मुख्य-धारा से अलग जन-क्षेत्र मानकर, उसकी सांकेतिक उपस्थिति दर्ज हुई है। यह अनिवार्य रूप से स्त्री-लेखन की कमज़ोरी न होकर साहित्यिक आलोचना की तंगदिली का परिणाम है। आलोचना का धर्म है कि वह रचना के मर्म तक पहुँच कर उसी से सवाल पूछे और उसके भीतर छिपे हुए छोटे-छोटे अंत:पाठों को उजागर करे। स्त्री-साहित्य को पढ़ने की इस प्रक्रिया में रचना और आलोचना दोनों के पाठ बदलेंगे। बड़ी चुनौती जेंडर को बदलने की नहीं है, बड़ी चुनौती सत्ता और वर्चस्व के चौखटों को तोड़ने की है।  

‘स्त्री-चिंतन और विमर्श’ पुस्तक की संकल्पना एक उदारवादी संकल्पना है। इसमें स्त्री-साहित्य से संबंधित अनेक प्रकार के लेख व निबंधों को एक साथ रखा गया है। चिंतन और विमर्श की के बीच की तरलता यहां उपस्थित है। स्त्री रचनाकारों की कलम से विविध विषयों पर लिखे गए निबंधों को इस पुस्तक में जगह मिली है जो स्त्री रचनाशीलता और स्त्री की वैचारिकता का प्रखरतावादी स्वर है। कुछ लेख बाज़ार, सिनेमा और स्त्री-छवि पर केंद्रित हैं। बाज़ार ने स्त्रीवादी चिंतन को अपनी तरह इस्तेमाल किया। परिवार में स्त्री का चुप रह जाना यदि एक प्रकार का अनुकूलन है तो बाज़ार में स्त्री-मुक्ति को दैहिक मुक्ति का पर्याय बना देना एक दूसरे प्रकार का अनुकूलन है। इनके अतिरिक्त अल्पसंख्यक, दलित तथा आदिवासी महिलाओं के अपने मसले हैं। स्त्री-चिंतन और विमर्श के विस्तार को समझने के कुछ अनछुए पहलू भी हैं जैसे ‘जेंडर और अनुवाद’, ‘इको फेमिनिज़म’ या फिर ‘यात्रा करती स्त्रियाँ’ आदि। इन सबको समेटकर ही इस पुस्तक का संयोजन हुआ है। हमारी यही कोशिश है कि एक समावेशी अध्ययन सामग्री प्रस्तुत कर सकें जो इस विषय के विस्तार को समझने में सहायक हो। यह पुस्तक विद्यार्थियों व शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध होगी।  

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